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नयी दिल्ली, चार सितंबर (भाषा) सरकार द्वारा संचालित या वित्तीय सहायता प्राप्त स्वास्थ्य सेवा केन्द्रों में मानसिक रोगियों के उपचार के लिये आवश्यक दवाओं की कथित अनुपलब्धता के मामले में उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केन्द्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा। प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमणियन की पीठ इस मामले को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के लिये सहमत हो गयी और उसने केन्द्र, राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशो को नोटिस जारी किये। यह याचिका अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने दायर की है। याचिका में राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में आवश्यक दवाओं की सूची की अधिसूचना तत्काल जारी करने और मानसिक विकार से ग्रस्त व्यक्तिों को नि:शुल्क ये दवायें उपलबध कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। याचिका में कहा गया है कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले साल अगस्त में सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को एक पत्र लिखा था जिसमें मनोरोग से संबंधित दवाओं की सूची संलग्न थी। पत्र में यह अनुरोध भी किया गया था कि विभिन्न स्वास्थ्य सेवा केन्द्रों में इन दवाओं को उपलब्ध कराया जाये। याचिका में कहा गया है, ‘‘यह शर्मनाक स्थिति है कि आजादी के 73 साल बाद भी हमारे देश में मानसिक विकार से ग्रस्त गरीब मरीजों को केन्द्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण द्वारा मानसिक बीमारी के इलाज के लिये निर्धारित आवश्यक दवायें नहीं मिल पा रही हैं। बंसल ने मानसिक स्वास्थ्य सेवा कानून, 2017 के प्रावधानों का भी याचिका में जिक्र किया है और कहा है कि मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्तियें को सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र से लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली तक में नि:शुल्क दवाओं का अधिकार प्रदान किया गया है। कानून में प्रावधान है कि प्राधिकारी आवश्यक दवाओं की सूची अधिसूचित करेंगे और ऐसी सभी दवायें सारे मानसिक रोगियों को मुफ्त में दी जायेंगी। याचिका में कहा गया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय के अगस्त, 2019 के पत्र के बाद उसने इस कानून के अमल की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदन किया था। इस आवेदन के जवाब में याचिकाकर्ता को पता चला कि अधिकांश राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने 2017 के कानून के प्रावधान का उल्लंघन किया है और गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले मरीज सरकार द्वारा संचालित या वित्तपोषित स्वास्थ्य सेवा केन्द्रों से मानसिक विकार के इलाज की दवा प्राप्त करने में असमर्थ हैं।